गोविंद नगर पुलिस ने शातिर चोरी गैंग का किया भंडाफोड़, 4 गिरफ्तार...
- 18h ago
वृंदावन। श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मूल गर्भगृह स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को अब नई पीढ़ी का साथ मिलेगा। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के आह्वान पर राधाकृष्ण कृपा धाम में आयोजित वृहद कार्यक्रम में युवाओं को आंदोलन की प्रतीकात्मक मशाल सौंपकर अभियान को नई दिशा देने का संकल्प लिया गया।
कार्यक्रम में न्यास के अध्यक्ष एवं हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने कहा कि सनातन धर्म की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मशाल सौंपना केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि आंदोलन की जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंपने की शुरुआत है।
इस अवसर पर साधु-संतों, महिलाओं, किसानों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं तथा विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम में उपस्थित युवाओं ने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प भी लिया।
महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि आगामी चरण में इस अभियान से हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन समाज के युवाओं, पूर्व सैनिकों, पुरातत्वविदों और सेवानिवृत्त अधिकारियों को भी जोड़ा जाएगा, ताकि आंदोलन को व्यापक सामाजिक स्वरूप दिया जा सके।
वृंदावन। श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मूल गर्भगृह स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को अब नई पीढ़ी का साथ मिलेगा। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के आह्वान पर राधाकृष्ण कृपा धाम में आयोजित वृहद कार्यक्रम में युवाओं को आंदोलन की प्रतीकात्मक मशाल सौंपकर अभियान को नई दिशा देने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम में न्यास के अध्यक्ष एवं हिंदू पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह एडवोकेट ने कहा कि सनातन धर्म की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मशाल सौंपना केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि आंदोलन की जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंपने की शुरुआत है। इस अवसर पर साधु-संतों, महिलाओं, किसानों, डॉक्टरों, अधिवक्ताओं तथा विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम में उपस्थित युवाओं ने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प भी लिया। महेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि आगामी चरण में इस अभियान से हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन समाज के युवाओं, पूर्व सैनिकों, पुरातत्वविदों और सेवानिवृत्त अधिकारियों को भी जोड़ा जाएगा, ताकि आंदोलन को व्यापक सामाजिक स्वरूप दिया जा सके।
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