संरक्षित वन भूमि पर चला वन विभाग का बुलडोजर, अवैध बैनर-पोस्टर हटाए; कार्रवाई जारी रहने...
- 10h ago
वृंदावन के प्रसिद्ध श्री रंगनाथ मंदिर में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार गज-ग्राह लीला का भव्य एवं मनोहारी मंचन किया गया। इस दौरान मंदिर परिसर "भगवान रंगनाथ की जय" के जयकारों से गूंज उठा और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस दिव्य लीला के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
परंपरा के अनुसार मंदिर के गर्भगृह से स्वर्ण निर्मित गरुड़ वाहन पर विराजमान सुदर्शन चक्रधारी भगवान रंगनाथ की भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जो मंदिर के पूर्वी द्वार स्थित पुष्करणी तक पहुंची। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच सेवायतों द्वारा पाठ किए जाने के बाद गज-ग्राह लीला का मंचन प्रारंभ हुआ।
लीला में पौराणिक प्रसंग का जीवंत चित्रण किया गया, जिसमें जलाशय में मगरमच्छ (ग्राह) द्वारा पकड़े गए गजराज की करुण पुकार सुनकर भगवान रंगनाथ बिना चरण पादुका धारण किए अपने भक्त की रक्षा के लिए तत्काल पहुंचे। भगवान ने सुदर्शन चक्र से ग्राह का वध कर गजराज को संकट से मुक्त कराया और ग्राह को भी मोक्ष प्रदान किया। इस भावपूर्ण लीला ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।
करीब आधे घंटे तक चली इस दिव्य लीला के समापन पर कुंभ आरती का आयोजन किया गया। इसके बाद भगवान रंगनाथ की सवारी पुनः भव्य रूप से गर्भगृह में विराजमान हुई। श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की।
मंदिर के अनुज स्वामी ने बताया कि स्थापना काल से चली आ रही यह पौराणिक परंपरा इस बात का संदेश देती है कि भगवान अपने सच्चे भक्त की पुकार सुनकर उसकी रक्षा के लिए स्वयं दौड़े चले आते हैं। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित इस दिव्य आयोजन ने श्रद्धालुओं को भक्ति और आस्था के अद्भुत भाव से सराबोर कर दिया।
वृंदावन के प्रसिद्ध श्री रंगनाथ मंदिर में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार गज-ग्राह लीला का भव्य एवं मनोहारी मंचन किया गया। इस दौरान मंदिर परिसर "भगवान रंगनाथ की जय" के जयकारों से गूंज उठा और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इस दिव्य लीला के दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त किया। परंपरा के अनुसार मंदिर के गर्भगृह से स्वर्ण निर्मित गरुड़ वाहन पर विराजमान सुदर्शन चक्रधारी भगवान रंगनाथ की भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जो मंदिर के पूर्वी द्वार स्थित पुष्करणी तक पहुंची। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच सेवायतों द्वारा पाठ किए जाने के बाद गज-ग्राह लीला का मंचन प्रारंभ हुआ। लीला में पौराणिक प्रसंग का जीवंत चित्रण किया गया, जिसमें जलाशय में मगरमच्छ (ग्राह) द्वारा पकड़े गए गजराज की करुण पुकार सुनकर भगवान रंगनाथ बिना चरण पादुका धारण किए अपने भक्त की रक्षा के लिए तत्काल पहुंचे। भगवान ने सुदर्शन चक्र से ग्राह का वध कर गजराज को संकट से मुक्त कराया और ग्राह को भी मोक्ष प्रदान किया। इस भावपूर्ण लीला ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। करीब आधे घंटे तक चली इस दिव्य लीला के समापन पर कुंभ आरती का आयोजन किया गया। इसके बाद भगवान रंगनाथ की सवारी पुनः भव्य रूप से गर्भगृह में विराजमान हुई। श्रद्धालुओं ने भगवान के दर्शन कर सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना की। मंदिर के अनुज स्वामी ने बताया कि स्थापना काल से चली आ रही यह पौराणिक परंपरा इस बात का संदेश देती है कि भगवान अपने सच्चे भक्त की पुकार सुनकर उसकी रक्षा के लिए स्वयं दौड़े चले आते हैं। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित इस दिव्य आयोजन ने श्रद्धालुओं को भक्ति और आस्था के अद्भुत भाव से सराबोर कर दिया।
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