रणथंभौर के दो बाघ बने मिसाल, 'मछली' और 'डॉलर' ने रचा वन्यजीव संरक्षण का इतिहास

  • 14h ago
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राजस्थान का रणथंभौर टाइगर रिजर्व सिर्फ बाघों के लिए ही नहीं, बल्कि दो ऐसे बाघों की वजह से भी पूरी दुनिया में जाना जाता है, जिन्होंने वन्यजीव संरक्षण की मिसाल कायम की। इनमें सबसे पहला नाम है मशहूर बाघिन 'मछली' (Machli) का, जिसे 'क्वीन ऑफ रणथंभौर' और 'क्वीन मदर ऑफ टाइगर्स' के नाम से जाना जाता है।

मछली ने अपने जीवनकाल में 11 शावकों को जन्म दिया। उसके वंशजों ने न केवल रणथंभौर में बाघों की संख्या बढ़ाई, बल्कि सरिस्का टाइगर रिजर्व में भी बाघों की आबादी बसाने में अहम भूमिका निभाई। उसकी लोकप्रियता के चलते देश-विदेश से लाखों पर्यटक रणथंभौर पहुंचे, जिससे वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन दोनों को नई पहचान मिली।

वहीं, 'डॉलर' (T-25) नाम का नर बाघ अपने अनोखे व्यवहार के कारण इतिहास में दर्ज है। एक बाघिन की मौत के बाद उसने उसके दो अनाथ शावकों की न केवल रक्षा की, बल्कि उन्हें शिकार करना और जंगल में जीवित रहना भी सिखाया। विशेषज्ञ इसे बाघों के व्यवहार का बेहद दुर्लभ उदाहरण मानते हैं।

रणथंभौर आज देश के सबसे सफल टाइगर रिजर्व में गिना जाता है। हाल के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में 149 बाघ हैं, जिनमें लगभग आधे रणथंभौर में पाए जाते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि मछली और डॉलर जैसे बाघों की विरासत ने भारत में बाघ संरक्षण की सफलता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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