यमुना एक्सप्रेसवे पर हादसों का सिलसिला लगातार जारी है। लगभग हर सप्ताह तेज रफ्तार और लापरवाही के कारण किसी न किसी परिवार का चिराग बुझ रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभागों की कार्यशैली में अब तक कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है।
एआरटीओ और परिवहन विभाग समय-समय पर संयुक्त चेकिंग अभियान चलाने का दावा तो करते हैं, लेकिन कार्रवाई अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है। यही वजह है कि कई निजी बस संचालक नियमों की खुलेआम अनदेखी करते हैं। आरोप है कि कई मामलों में चालक ड्यूटी के दौरान नशे की हालत में वाहन चलाते हैं या फिर बस की स्टेयरिंग परिचालक और हेल्पर के हाथों में सौंप देते हैं। सबसे बड़ा खामियाजा यात्रियों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।
सोमवार को यमुना एक्सप्रेसवे पर हुए भीषण हादसे में भी ऐसी ही गंभीर लापरवाही सामने आई है। घायल यात्रियों के अनुसार, हादसे के समय बस का चालक नहीं, बल्कि परिचालक बस चला रहा था। बस करीब 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ रही थी और लगातार दूसरे वाहनों को ओवरटेक किया जा रहा था।
यात्रियों का कहना है कि उन्होंने कई बार बस की गति कम करने की गुहार लगाई, लेकिन चालक और परिचालक ने किसी की एक नहीं सुनी। तेज रफ्तार के कारण बस कई बार असंतुलित भी हुई, इसके बावजूद रफ्तार कम नहीं की गई। आखिरकार बस आगे चल रहे ट्रेलर में जा घुसी और भीषण हादसा हो गया।
इस हादसे में चार लोगों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि 27 यात्री घायल हुए हैं। कई घायलों का इलाज अभी भी अस्पताल में चल रहा है।
एसएसपी श्लोक कुमार ने भी प्रारंभिक जांच में बताया कि हादसे के समय बस का चालक आराम कर रहा था और स्टेयरिंग परिचालक के हाथ में थी। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कह रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यमुना एक्सप्रेसवे पर कब तक यात्रियों की जान से खिलवाड़ होता रहेगा? क्या सिर्फ हादसों के बाद कार्रवाई होगी या फिर भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने के लिए ठोस कदम भी उठाए जाएंगे? यही सवाल आज हर यात्री और उसके परिवार के मन में है।