चांद पर इंसान पहुंच चुका है और दुनिया आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रही है, लेकिन मथुरा जनपद में एक ऐसा मोहल्ला भी है, जहां करीब 250 साल पुरानी मान्यता के चलते करवाचौथ नहीं मनाया जाता। यहां चांद तो निकलता है, लेकिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए न तो करवाचौथ का व्रत रखती हैं और न ही चांद के दर्शन करती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इसके पीछे एक नवविवाहिता ब्राह्मणी की दर्दनाक कहानी और सती के श्राप से जुड़ी मान्यता है। आखिर क्या है पूरा मामला, आइए जानते हैं।
मथुरा के सुरीर कस्बे के बघा मोहल्ले में करवाचौथ का त्योहार दूसरे इलाकों से बिल्कुल अलग है। जहां देशभर में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ निर्जला व्रत रखती हैं, वहीं इस मोहल्ले में महिलाएं वर्षों से चली आ रही परंपरा का पालन करते हुए करवाचौथ नहीं मनातीं।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, करीब 250 साल पहले हुई एक घटना के बाद से ही यहां यह परंपरा चली आ रही है। मोहल्ले की महिलाओं के लिए इस परंपरा का पालन करना आज भी एक सामाजिक और भावनात्मक विषय बना हुआ है।
इस परंपरा का सबसे ज्यादा मलाल उन नवविवाहिताओं को होता है, जो शादी के बाद पहली बार करवाचौथ मनाने की इच्छा रखती हैं। इसी साल शादी करके आईं प्रिया पत्नी डब्बू ठाकुर भी अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखना चाहती थीं, लेकिन परिवार में प्रचलित मान्यता के चलते वह व्रत नहीं रख सकीं।
वहीं, करीब आठ साल पहले ब्याहकर आईं सपना की भी पहले करवाचौथ पर व्रत रखने की इच्छा थी, लेकिन परंपरा के चलते उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी।
मोहल्ले की बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि वे परिवार की सलामती और सुख-शांति में विश्वास रखती हैं। रामवती का कहना है कि अब सती माता श्राप नहीं, बल्कि आशीर्वाद देती हैं, लेकिन वर्षों से चली आ रही परंपरा को तोड़ने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, करीब 250 साल पहले नौहझील थाना क्षेत्र के रामनगला गांव का एक ब्राह्मण युवक गौना कराकर अपनी नवविवाहिता पत्नी को भैंसा-बुग्गी से घर लेकर जा रहा था। इसी दौरान सुरीर में कुछ लोगों ने बुग्गी रोककर भैंसे पर अपना दावा जताया। देखते ही देखते विवाद बढ़ गया और कथित तौर पर ब्राह्मण युवक की हत्या कर दी गई।
पति की मौत से आहत नवविवाहिता ने मोहल्ले के लोगों को श्राप दिया और सती हो गई। स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित कहानी के अनुसार, इसके बाद कई नवविवाहिताओं के विधवा होने और युवकों की मौत की घटनाओं को सती के श्राप से जोड़कर देखा जाने लगा।
बताया जाता है कि तभी से मोहल्ले में करवाचौथ नहीं मनाने की परंपरा शुरू हुई। स्थानीय मान्यता के चलते महिलाएं इस दिन व्रत रखने और पूरे सोलह शृंगार से भी परहेज करती हैं।इस परंपरा का असर केवल बघा मोहल्ले तक सीमित होने की मान्यता नहीं है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, रामनगला गांव के ग्रामीण भी आज तक सुरीर में खाना खाने और पानी पीने से बचते हैं। वहीं, कस्बे में सती माता का मंदिर भी बना हुआ है, जहां विभिन्न जातियों के लोग शादी-विवाह जैसे शुभ अवसरों पर माथा टेककर पूजा-अर्चना करते हैं।
आधुनिकता के इस दौर में भी सुरीर के बघा मोहल्ले में करीब ढाई सौ साल पुरानी मान्यता लोगों की जिंदगी और परंपराओं का हिस्सा बनी हुई है। कहीं करवाचौथ पर चांद के दीदार के लिए सुहागिनें बेसब्री से इंतजार करती हैं, तो कहीं चांद निकलने के बावजूद यह त्योहार नहीं मनाया जाता। आस्था, परंपरा और इतिहास से जुड़ी यह कहानी आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय है।